अयोध्या मामला ही नहीं इन फैसलों के लिए भी जाने जाएंगे पूर्व चीफ जस्टिस गोगोई
अरूण राणा/नई दिल्ली
रविवार 17 नवंबर- 2019 को अपने पद से सेवानिवृत्त हुए सीजेआई रंजन गोगोई अयोध्या विवाद में दिए गए फैसले ही नही बल्कि कई और महत्वपूर्ण फैसलों के लिए भी याद किए जाएंगे।् इनमें अयोध्या का राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवाद मामला प्रमुख है। न्यायमूर्ति गोगोई अपनी निर्भीकता और साहस के लिए जाने जाते रहेंगे। गोगोई उन चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों में शामिल थे,जिन्होंने पिछले साल जनवरी में संवाददाता सम्मेलन कर तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के कामकाज के तरीके पर सवाल उठाए थे। न्यायमूर्ति गोगोई और शीर्ष न्यायालय के तीन अन्य न्यायाधीशों न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर, न्यायमूर्ति मदन बी0 लोकुर और न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ ने 12 जनवरी 2018 को अभूतपूर्व कदम उठाते हुए संवाददाता सम्मेलन कर आरोप लगाया था कि सुप्रीम कोर्ट में प्रशासन और मुकदमों का आवंटन सही तरीके से नहीं हो रहा। सीजेआई के पद पर न्यायमूर्ति गोगोई का कार्यकाल विवादों से अछूता नहीं रहा। उन्हें यौन उत्पीड़न के आरोपों का सामना करना पड़ा। हालांकि वह इसमें पाक.साफ करार दिए गए। उस समय जस्टिस एस0 ए0 बोबडे की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय एक आंतरिक जांच समिति ने उन्हें इस मामले में क्लीन चिट दे दी। तत्कालीन सीजेआई गोगोई की अध्यक्षता वाली एक संविधान पीठ ने अपने फैसले में हिंदुओं को राम मंदिर के निर्माण के लिए 2.77 एकड़ विवादित भूमि सौंप दी और यह आदेश भी दिया कि मुसलमानों को इस पवित्र नगरी में एक मस्जिद बनाने के लिए किसी प्रमुख स्थान पर पांच एकड़ जमीन दी जाए। गोगोई ने उस पीठ की भी अध्यक्षता की, जिसने सबरीमला मामले में 3/2 के बहुमत से फैसला दिया। उनकी अध्यक्षता वाली पीठ ने केरल के सबरीमला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देने के 2018 के फैसले पर पुनर्विचार की याचिका के साथ ही मुस्लिम और पारसी महिलाओं के साथ कथित रूप से भेदभाव करने वाले अन्य विवादास्पद मुद्दों को फैसले के लिए सात सदस्यीय संविधान पीठ को सौंप दिया। रंजन गोगोई द्वारा लिखे गए बहुमत के निर्णय में पुनर्विचार याचिकाएं सात न्यायाधीशों की पीठ के लिए लंबित रखी गई, लेकिन उसने 28 सितंबर 2018 के बहुमत के फैसले पर रोक नहीं लगाई जो सभी आयु वर्ग की महिलाओं को इस मंदिर में प्रवेश की अनुमति देता है। न्यायमूर्ति गोगोई का नाम उस पीठ की अध्यक्षता करने के लिए भी याद रखा जाएगा। जिसने राफेल लड़ाकू विमान सौदे के मामले में दो बार मोदी सरकार को क्लीन चिट दी। पहली बार रिट याचिका पर और फिर दूसरी बार पुनर्विचार याचिकाओं पर। इन याचिकाओं के जरिए राफेल लड़ाकू विमानों के सौदे पर शीर्ष न्यायालय के 14 दिसंबर 2018 के फैसले पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया गया था। साथ ही, पीठ ने शीर्ष न्यायालय की कुछ टिप्पणियों को गलत तरीके से कहने को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी को फटकार लगाई और उन्हें भविष्य में अधिक सावधानी बरतने की नसीहत दी। देश के 46 वें एवं पूर्वोत्तर के किसी राज्य से भारत के प्रथम सीजेआई न्यायमूर्ति गोगोई ने उस पीठ की भी अध्यक्षता की, जिसने 13 नवंबर को अपने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय सूचना का अधिकार यानी आरटीआई कानून के तहत एक सार्वजनिक प्राधिकार है। हालांकि पीठ ने यह भी कहा कि सार्वजनिक हित में सूचना का खुलासा करते हुए न्यायपालिका की स्वतंत्रता को ध्यान में रखा जाए। न्यायमूर्ति गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की एक संविधान पीठ ने सरकार को झटका देते हुए विभिन्न न्यायाधिकरणों के सदस्यों की नियुक्ति और सेवा शर्तों के संबंध में केंद्र द्वारा बनाए गए नियमों को खारिज कर दिया। न्यायालय ने धन विधेयक के रूप में वित्त अधिनियम 2017 को पारित कराने की वैधता की जांच के लिए इसे बड़ी पीठ के पास भेज दिया। विपक्षी दलों ने संसद में इस विधेयक का जोरदार विरोध किया था। इन अहम फैसलों के अलावा न्यायमूर्ति गोगोई ने उस पीठ की भी अध्यक्षता की, जिसने उनके गृह राज्य असम में राष्ट्रीय नागरिक पंजी0 को तैयार करने की प्रक्रिया की निगरानी की। एनआरसी को लेकर काफी विवाद हुआ लेकिन वह अपने रुख पर अडिग रहे। वह सुप्रीम कोर्ट के कक्ष संख्या एक में पीठ में अंतिम बार 15 नवंबर-2019 को शामिल हुए। शीर्ष न्यायालय का कक्ष संख्या एक प्रधान न्यायाधीश का कक्ष होता है। न्यायमूर्ति गोगोई महज चार मिनट के लिए इस पीठ में बैठे। पीठ में उनके अतिरिक्त न्यायमूर्ति एस0ए0 बोबडे भी थे। जो देश के अब नए प्रधान न्यायाधीश हैं। इसके बाद वह राजघाट गए और वहां महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित की। वह तीन अकटूबर 2018 को सीजेआई पद की शपथ लेने के बाद भी राष्ट्रपिता के समाधि स्थल पर गए थे। उनका कार्यकाल 13 महीने से कुछ अधिक समय का रहा और 17 नवंबर-2019 रविवार को समाप्त हो गया। भारतीय न्यायपालिका के नेतृत्व का दायित्व संभालने और शीर्ष न्यायालय का न्यायाधीश के तौर पर न्यायमूर्ति गोगोई के करियर में कई उतार चढ़ाव आए लेकिन यह उन्हें विभिन्न मुद्दों पर आगे बढ़ने से डिगा नहीं सका। हालांकि, न्यायमूर्ति गोगोई कड़े और कभी .कभी चौंकाने वाले फैसले देने को लेकर जाने जाते हैं, लेकिन अयोध्या मामले में उन्होंने तय किया कि दलीलों को लंबे समय तक खींचे जाने की इजाजत नहीं दी जाएगी और 18 अक्टूबर की निर्धारित समय सीमा से दो दिन पहले ही यह कहते हुए सुनवाई पूरी कर दी कि बस बहुत हो गया। उन्होंने तीन अन्य न्यायाधीशों के साथ किए संवाददाता सम्मेलन के बाद यह टिप्पणी की थी कि स्वतंत्र न्यायाधीश और सवाल करने वाले पत्रकार लोकतंत्र की प्रथम रक्षा पंक्ति हैं। उन्होंने इसी कार्यक्रम में कहा था कि न्यापालिका को आम आदमी की सेवा योग्य बनाये रखने के लिए एक क्रांति की जरूरत है ना कि सुधार की। उनके सीजेआई पद पर रहने के दौरान उन्होंने गलती करने वाले न्यायाधीशों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की और उनके तबादलों की सिफारिशें की। यही नही, इसी कड़ी में एक उच्च न्यायालय की एक महिला मुख्य न्यायाधीश का तबादला किया,जिसके बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।